Thursday, January 9, 2014

मै नारी हूँ

मै नारी हूँ ...
शब्द बदले , परिभाषा बदली , 
नहीं बदली तो तुम्हारे द्वारा मेरे लिय खिंची लक्ष्मण रेखा ...
आँचल में दूध , आँखों में पानी , आज भी हमारे साथ है ...
नज़रें घूरतीं है तुम्हारी हमकों , 
हर अंग-अंग को हमारे नाप लेतीं हैं तुम्हारी नज़रे ....
लगता है छिन्न-छिन्न कर देंगी हमारे शरीर को ,
डर लगता था गैरों से , अब तो अपने भी वहशी हो चले ...
सीता भी हम , सावित्री भी हम , अहिल्या भी हम , मीरा भी हम ,
और सती भी हम ...
सब तुम्हारे ही बनाये आदर्श हैं ...
कभी सोचा है ,
हमसे ही जन्मे और हम पर ही घात लगाये बैठे हो तुम ....
अच्छा है तुमको कुंती के मन्त्र नहीं मालूम ,
नहीं तो तुम राह चलते हमसे सम्भोग करते और
फिर समाजिकता की बेड़ियों में हमें जकड़ देते ,
वैसे जकड़ते तो तुम अब भी हो ...
शरीर ही नहीं, आत्मा तक को तुम नष्ट कर देते हो ...
सृष्टि की सबसे अनुपम कृति कहा तुमने ,
माँ , बहन , पत्नी , दोस्त अभी रूपों में सराहा तुमने ...
फिर एक झटके में अस्मिता को हमारी कौड़ियों के दाम भी रौंदा तुमने ...
तुम्हारे पास हमारे लिय लेख हैं , बड़े बड़े भाषणों की श्रृंखला है ,
पर उनमे देखा है हम कहाँ हैं ...
स्वावलंबन , आत्मनिर्भरता , सहभागिता जैसे मूल्यों को तो गढ़ा तुमने ,
पर सजीव मूर्त रूप न दे पाए ....
हर बार छला तुमने हमारी ममता को ,
कभी सुना है हमारी कराहती आत्मा की आवाज़ , रोम रोम चीखता है तुम्हारे अत्याचारों से ,
जब मन आया तो भोग लगाया नहीं तो उपभोग बनाकर बाज़ार में बैठाया ...
बिकती रही हमारी पहचान गांवों में , शहरों और तुम्हारे
लिखे साहित्यों में ..
जब आवाज उठायी हमने तो बन गये तुम क्रूर से भी ज्यादा क्रूर ,
और खींच दी सीमाएं कभी घर की, कभी परिवार की और बन गये पुरुष ...
हम हैं आधी आबादी का सच ...
हाँ मै नारी हूँ ...........

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