Thursday, January 9, 2014

बरसो रे मेघा

बरसने दो इन मेघों को झूम कर ...
बहुत प्यासी है ये धरती , बहुत प्यासी है ये नदियाँ ...
अब जी भर कर नीर बहा लेने दो इन मेघों को ...
खूब तरसे हैं हम तुम्हारे लिय ...
सूख गये हैं कंठ इन बूंदों के लिय ...
अब खूब गरज लेने दो इन मेघों को ...
इतना बरसो तुम राजा इस अम्बर के ...
की छूट ना जाये कोई कोना इस अवनी का ...
इतना चमको की फीकी पड़ जाये चमक किसी प्रेयसी की ...
अब बरसो रे मेघा खूब बरसो ...
भीग लेने दो जर्रा जर्रा इस क्षितिज का ...
खेल लेने दो बच्चों को इन बूंदों में ...
भीग जाने दो इस यौवन को बारिश में ...
अब जो तुमने छेड़ी है अपनी तान ...
तो मत रुकना बस झूम के बरसना ...
अल्हड़ हो कर बरसना, बस बरसना, बस बरसना ........

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