Thursday, January 9, 2014

चुप क्यों

ये शाम चुप है ...ये शाहिल चुप है ...
फिर धडकनों में शोर इतना क्यों हैं ...
लब थरथराते हैं ...कहना कुछ चाहते हैं ...
फिर अलफ़ाज़ चुप क्यों हैं ...
वैसे तो बहुत कुछ है , हाले दिल बयां करने को ...
फिर ये निगाहें चुप क्यों है ...

बरसो रे मेघा

बरसने दो इन मेघों को झूम कर ...
बहुत प्यासी है ये धरती , बहुत प्यासी है ये नदियाँ ...
अब जी भर कर नीर बहा लेने दो इन मेघों को ...
खूब तरसे हैं हम तुम्हारे लिय ...
सूख गये हैं कंठ इन बूंदों के लिय ...
अब खूब गरज लेने दो इन मेघों को ...
इतना बरसो तुम राजा इस अम्बर के ...
की छूट ना जाये कोई कोना इस अवनी का ...
इतना चमको की फीकी पड़ जाये चमक किसी प्रेयसी की ...
अब बरसो रे मेघा खूब बरसो ...
भीग लेने दो जर्रा जर्रा इस क्षितिज का ...
खेल लेने दो बच्चों को इन बूंदों में ...
भीग जाने दो इस यौवन को बारिश में ...
अब जो तुमने छेड़ी है अपनी तान ...
तो मत रुकना बस झूम के बरसना ...
अल्हड़ हो कर बरसना, बस बरसना, बस बरसना ........

नाम आपका

एक मीठा एहसास ...मिट्टी कि सौंधी खुश्बू...
अनारादानो सम मुस्कान ... भोर कि पहली किरण ...
निशा कि शांति ...नदी कि खिलखिलाहट ...
पुरवा हवा कि ठंडक ...फूलों कि ताज़गी ...
नीले आसमान कि गह्राराई ...बादलों कि पुरवाई ...
लहरों कि अंगड़ाई ...भौरें कि गुंजन...
मोती कि चमक ...साहिल कि मौजें ...
शिवालय कि पूजा ...राधा का प्रेम ...
पंक्षियों का कलरव ...पौधों कि कपोलें ...
बारिश कि रिमझिम बौछारें ...ओस कि घास पर बूंदें ...
माथे पर लाल बिंदियाँ ...
और आँखों में बसे प्यारे सपनों को...
कोई नाम दूँ तो वो बस आपका ही होगा

क्या लिखूं


“क्या लिखूं इन कुछ बीते लम्हों को
शब्दों में…
खुद से बाते करते रहे, सूनेपन को
तेरे वजूद में तलाशते रहे… 
हर मोड़ सामने था, तुझसे दूर जाने का,
पास आने की उम्मीद में सारी रात जागते रहे…
बहुत कुछ है कहने सुनने को है,
इस मौसम से, गीली हवा से , नम ओस से,
पर ये सुनते कहाँ हैं, तेरी तपिश में पिघलते कहाँ है…
कभी मिलना तो बताएँगे तुमको
क्या बातें करते है खुद से, खुद के सूनेपन को भरने के लिए…
वो घरौंदा , वो पगडंडी और वो यादों के झूले
सबको है तुम्हारी आस,
और आस है मेरे सूनेपन को तुम्हारे कुछ मीठे एहसासों की”
 

मै नारी हूँ

मै नारी हूँ ...
शब्द बदले , परिभाषा बदली , 
नहीं बदली तो तुम्हारे द्वारा मेरे लिय खिंची लक्ष्मण रेखा ...
आँचल में दूध , आँखों में पानी , आज भी हमारे साथ है ...
नज़रें घूरतीं है तुम्हारी हमकों , 
हर अंग-अंग को हमारे नाप लेतीं हैं तुम्हारी नज़रे ....
लगता है छिन्न-छिन्न कर देंगी हमारे शरीर को ,
डर लगता था गैरों से , अब तो अपने भी वहशी हो चले ...
सीता भी हम , सावित्री भी हम , अहिल्या भी हम , मीरा भी हम ,
और सती भी हम ...
सब तुम्हारे ही बनाये आदर्श हैं ...
कभी सोचा है ,
हमसे ही जन्मे और हम पर ही घात लगाये बैठे हो तुम ....
अच्छा है तुमको कुंती के मन्त्र नहीं मालूम ,
नहीं तो तुम राह चलते हमसे सम्भोग करते और
फिर समाजिकता की बेड़ियों में हमें जकड़ देते ,
वैसे जकड़ते तो तुम अब भी हो ...
शरीर ही नहीं, आत्मा तक को तुम नष्ट कर देते हो ...
सृष्टि की सबसे अनुपम कृति कहा तुमने ,
माँ , बहन , पत्नी , दोस्त अभी रूपों में सराहा तुमने ...
फिर एक झटके में अस्मिता को हमारी कौड़ियों के दाम भी रौंदा तुमने ...
तुम्हारे पास हमारे लिय लेख हैं , बड़े बड़े भाषणों की श्रृंखला है ,
पर उनमे देखा है हम कहाँ हैं ...
स्वावलंबन , आत्मनिर्भरता , सहभागिता जैसे मूल्यों को तो गढ़ा तुमने ,
पर सजीव मूर्त रूप न दे पाए ....
हर बार छला तुमने हमारी ममता को ,
कभी सुना है हमारी कराहती आत्मा की आवाज़ , रोम रोम चीखता है तुम्हारे अत्याचारों से ,
जब मन आया तो भोग लगाया नहीं तो उपभोग बनाकर बाज़ार में बैठाया ...
बिकती रही हमारी पहचान गांवों में , शहरों और तुम्हारे
लिखे साहित्यों में ..
जब आवाज उठायी हमने तो बन गये तुम क्रूर से भी ज्यादा क्रूर ,
और खींच दी सीमाएं कभी घर की, कभी परिवार की और बन गये पुरुष ...
हम हैं आधी आबादी का सच ...
हाँ मै नारी हूँ ...........

पहली मुलाकात

इक पुराने जमाने की नज्म याद आयी... 
गुनगुनाया तो तेरी खोयी तस्वीर उभर आयी... 
यहीँ जेठ का महीना, यहीँ पुरवा हवा, 
आंखे बँद की तो तेरी पहली मुलाकात याद आयी...

एहसास

आपको नही मालूम कि मै किन पलों को चुरा रहा हूँ…… 
कभी किताब में कोई फूल दबा कर रखा है…… 
कुछ दिनों बाद ना तो उसमे खुशबू होती है और ना ही ताजगी…… 
रह जाता है तो बस फूल रखने का एहसास और बीते पलों की यादें……