Thursday, January 9, 2014

दो किनारे


माना नही मिलते
दो किनारे एक राह के कभी ....
पर मेरी नजर से देख ऐ दोस्त मेरे ....
कभी जुदा भी नही होते एक दूजे से वो,
दो किनारे एक राह के ....
तेरी याद में रात भर सो न सके हम...
कहीं तन्हा ना उम्र बीत जाये ...
तुझसे मिलने की आस में .....

अक्श

ना चलो ए यार साये की तरह साथ मेरे ...
गर छूट गया हाथ जो तेरा इन ,
राहों के मोड़ो पर ...
तो अक्श खुद का तलाशने में मुश्किल होगी...

तुम मेरे लिय क्या हो



तुम मेरे लिय धीरे धीरे क्या हो...
अगर शब्दों में लिखूं तो सारांश बन रही हो ...
गीतों में कहूं तो ग़ज़ल में ढल रही हो ...
सुबह में सोचूँ तो ठंडी पवन लग रही हो...
और खुद में देखूं तो धडकनों में समा रही हो...
मेरे सपनों की सच्ची तस्वीर हो...
तुम मेरे लिय धीरे धीरे क्या हो...
मै जो ना समझ सका वो कहानी हो तुम ...
नदी की अल्हड जवानी हो तुम ...
कैसे तुम्हे मै सिर्फ सपनों में देखूं ...
मेरे हर पल के मौजों की रवानी हो तुम ...
तुम मेरे लिय धीरे धीरे क्या हो ...

टुकडो में जीना

मुझे टुकडो में जीना अच्छा लगता है ...
अपने लम्हों को सिक्कों की तरह हवा में उछालना अच्छा लगता है ...
मुमकिन है इसे आप मेरी आवारगी समझें ...
पर इस आवारगी में भी आपके पलों को चुराना अच्छा लगता है ,,,


मेरी आवारगी

क्या मिलेगा किसी को मेरे दिल की बेचैनियों से ...
एक दिन तन्हा खो जाउंगा यारों की छोड़ी गलियों में ...
मत करना जिक्र मेरी आवारगी का अपनी महफ़िलों का ...
वरना यादों के रास्ते आकर आँखे नम कर जाउंगा ...

यादों के गाँव

चलो यादों के गाँव में चलते हैं ...
दोस्त देखें हमारे बीते पलों कि मीठास कितनी हैं ...
इस राह में कई घरौंदे भी हमने बनायें हैं ...
वहां अब भी उन दावतों कि महक बाकी है ...
जो हमने साथ कि थी ...
कुछ विचारों को हमने साझा किया था ...
और पाया था विश्वास एक दुसरे का ..
माना कम है दूरी बीते पलों की ...
पर नींव पक्की है हमारे संबंधों की ...
वो बीता हुआ गाँव कह रहा है ...
आगे कदम करो ...
कई आयाम हमारी प्रतीक्षा में है ...
तुम देना साथ मेरा ...
बनना राह का रहगुजर ...
ताकि हम बना सकें विचारों के नये गाँव दोस्त ...