Sunday, March 22, 2015

"कुछ नीला आसमान"

"कुछ नीला आसमान आँखों में उतर आया,
आसुंओ में छिपे मीठे लम्हों की याद लाया,
कुछ सिली हवा, कुछ  बादल, कुछ सौंधी सी खुश्बू
और गीली मिट्टी में, बने पैरो के निशान,
बीते समय के पन्नों को हवा में उड़ा लाया,
कुछ नीला आसमान आँखों में उतर आया …
कल नहीं मिल पाया था, उन पन्नो में लिखे शब्दों से,
नहीं कह पाया था, कमी रहेगी हंसी - ठिठोली की,
आज फिर जीभर कर मिलूंगा, बीते लम्हों से,
कुछ मिलने की, कुछ बिछड़ने की, कुछ खोयी राहों की
और बात करूँगा कुछ अनकही शिकायतों की,
कुछ नीला आसमान आँखों में उतर आया,
जिन पन्नो को समझा कोरा ,
उकेरता रहा समय, अटपटे शब्दों को
कुछ सुबह को, कुछ अलसाये दिन को, कुछ ढलती शाम को,
और कुछ रात की बिखरी सलवटों को,
कुछ नीला आसमान आँखों में उतर आया,
आसुंओ में छिपे मीठे लम्हों की याद लाया"



Wednesday, September 24, 2014

अलसाये ख्वाब

''सुबह की अलसाई पलकों में,
कुछ अलसाये से ख्वाब छिपे है...
अधमुंदी नींद में तुम्हारा कुछ शेष छिपा है,
और छिपा है तुम्हारा,
सिली हवा सी मुझे छू जाना...
भोर की पहली किरण में,
जब तुम धुंधले सपने सी ओझिल होती हो...
बिखरे ख़्वाबों में,
मै तुम्हारे आने की बाट जोहता हूँ...
बिखरे शब्दों को जोड़कर,
मन के दोहरेपन को खुद की,
पलकों में समेट लेता हूँ...
सुबह की अलसाई पलकों में,
कुछ अलसाये से ख्वाब छिपे है''




Thursday, January 9, 2014

दो किनारे


माना नही मिलते
दो किनारे एक राह के कभी ....
पर मेरी नजर से देख ऐ दोस्त मेरे ....
कभी जुदा भी नही होते एक दूजे से वो,
दो किनारे एक राह के ....
तेरी याद में रात भर सो न सके हम...
कहीं तन्हा ना उम्र बीत जाये ...
तुझसे मिलने की आस में .....

अक्श

ना चलो ए यार साये की तरह साथ मेरे ...
गर छूट गया हाथ जो तेरा इन ,
राहों के मोड़ो पर ...
तो अक्श खुद का तलाशने में मुश्किल होगी...

तुम मेरे लिय क्या हो



तुम मेरे लिय धीरे धीरे क्या हो...
अगर शब्दों में लिखूं तो सारांश बन रही हो ...
गीतों में कहूं तो ग़ज़ल में ढल रही हो ...
सुबह में सोचूँ तो ठंडी पवन लग रही हो...
और खुद में देखूं तो धडकनों में समा रही हो...
मेरे सपनों की सच्ची तस्वीर हो...
तुम मेरे लिय धीरे धीरे क्या हो...
मै जो ना समझ सका वो कहानी हो तुम ...
नदी की अल्हड जवानी हो तुम ...
कैसे तुम्हे मै सिर्फ सपनों में देखूं ...
मेरे हर पल के मौजों की रवानी हो तुम ...
तुम मेरे लिय धीरे धीरे क्या हो ...

टुकडो में जीना

मुझे टुकडो में जीना अच्छा लगता है ...
अपने लम्हों को सिक्कों की तरह हवा में उछालना अच्छा लगता है ...
मुमकिन है इसे आप मेरी आवारगी समझें ...
पर इस आवारगी में भी आपके पलों को चुराना अच्छा लगता है ,,,