Sunday, April 14, 2013
एक दोस्त हो तुम
एक दोस्त हो तुम ...कुछ अलग से तस्वीर हो तुम ...
अपनों के बीच , अपनों की तलाश करती हो तुम ...
हंसकर बातें हो करती सबसे,
पर मन में सब छिपाती हो तुम...
बिंदास , अल्हड़, सपनों से परे,
एक कहानी हो तुम ...
खुद की रेखाओं से लडती हो तुम,
रेत पर खुद के निशान तलाशती हो तुम ...
कैसे पिरोउं शब्दों में ,
एक दोस्त हो तुम , कुछ अलग सी तस्वीर हो तुम ...
Thursday, April 19, 2012
यांदें
मेरे अधरों की मुस्कान पर मत जाओ,
अन्दर छिपे दर्द को मत कुरेदो,
कहीं ये पानी बनकर आँखों से जो छलका,
तो प्यार का समन्दर बन जायेगा ए यारों......
कभी किसी खूबसूरत मोड़ की तरह हम मिले,
फिर कुछ कदम साथ चले, और.....
उन बीते लम्हों को चलो शब्दों में ढाल दें,
उन्हें यादों का नया नाम दें.
माना नही मिलते दो किनारे एक राह के कभी ....
पर मेरी नजर से देख ऐ दोस्त मेरे ....
कभी जुदा भी नही होते एक दूजे से वो,
दो किनारे एक राह के ....
चलो अब तुम्हारे एहसास को गुनगुनी धूप की तरह जेहन में उतारते है ,
छितिज के आगे की जमीन को तलाशतें हैं ,
क्या हुआ जो मै खुद कारवां ना बन पाया...
तुम्हारे होने के एहसास से ,
जिंदगी के कारवां को नये रास्ते दिखातें हैं ....
अन्दर छिपे दर्द को मत कुरेदो,
कहीं ये पानी बनकर आँखों से जो छलका,
तो प्यार का समन्दर बन जायेगा ए यारों......
कभी किसी खूबसूरत मोड़ की तरह हम मिले,
फिर कुछ कदम साथ चले, और.....
उन बीते लम्हों को चलो शब्दों में ढाल दें,
उन्हें यादों का नया नाम दें.
माना नही मिलते दो किनारे एक राह के कभी ....
पर मेरी नजर से देख ऐ दोस्त मेरे ....
कभी जुदा भी नही होते एक दूजे से वो,
दो किनारे एक राह के ....
चलो अब तुम्हारे एहसास को गुनगुनी धूप की तरह जेहन में उतारते है ,
छितिज के आगे की जमीन को तलाशतें हैं ,
क्या हुआ जो मै खुद कारवां ना बन पाया...
तुम्हारे होने के एहसास से ,
जिंदगी के कारवां को नये रास्ते दिखातें हैं ....
Monday, February 6, 2012
मेरा मन
बात एक रूठे दिन की है
सूरज बादलों संग मिल मुझसे,आँख मिचौली कर रहा था,
तभी लगा की एक अजनबी भी मेरे अन्दर रहता है,
ध्यान से देखा तो पाया की साया मेरा साथ दे रहा है,
अचानक ही खुद से खुद की मुलाकात हो गयी,
मन में सवालों की उफान था, तो आँखों में निर्जीवता का पीलापन
उसने पूछा जानते हो मुझे,
संकोच भरी मुस्कराहट के साथ मैंने कहा नही,
बहुत जल्दी भूला दिया मुझको, अपने बसाए घरौंदे को
....
आवाज़ जानी-पहचानी थी, समझा तो पाया अपने मन को,
उसने पूछा ..
.....
जिसकी खिड़की से आने वाली शीतल हवाएं तुमको आनंदित करती थी,
दरवाजों पर आने वाले पैरों की थाप तुमको प्रेमग्न करती थी ,
तुमने भूला दिया सब बातों को, मर्यादाओं को
क्या मोड़ो के सामने तुम मुझे सूना छोड़ चले जाओगे,
या फिर संचय करोगे अनमोल यादों को
मै इन्तजार में हूँ तुम्हारे जबाव के,
उसने कहा मुझसे...
.
मुस्कान अधरों पर थी मेरी ...बात तो पूरे जीवन की थी
बस मैंने कहा रहना मेरे भीतर बनकर प्रेम मेरा, घरौंदा मेरा .......
शायद तुम मुझको जान ना पाए, पर अब जानो .
...
और रहो भीतर बन के अपनापन ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Monday, January 30, 2012
Friday, December 2, 2011
फिर क्यों
तुम नही हो, फिर क्यों तुम्हारा इन्तजार है,
अकेला हूँ फिर क्यों, सुबह-शाम तुम्हारे होने का एहसास है ,
तपा हूँ सूरज कि गर्मी में बहुत, सिसका भी हूँ ओस भरी रातों में,
फिर क्यों रमी हो अंतर्मन में मेरे ,
कई बार अकेला सहमा गुजरां हूँ मोड़ो से,
जहाँ से देखा है अपने सुने घरौंदे को,
उसके दरवाजों को अब भी है इन्तजार ,
तुम्हारे पैरों कि थापों का,
खिड़कियाँ अधीर है, खुलने को तुम संग छू कर जाने वाली हवाओं से ,
फिर क्यों दरकने लगी दीवारें इसकी ,
आज भी जिक्र है तुम्हारा घर के आँगन में,
माँ पूछती है कैसी है वो,
शुन्यता में टकटकी लगाये… निरुत्तर सा रहता हूँ मै,
फिर क्यों छू जाती हो तुम हवा के झोके सी,
हाँ साथ में याद है मुझे तुम्हारा
उन छोटी छोटी बातों पर रूठना, था नही
जिनका सम्बन्ध मुझसे कोई,
फिर मेरा अध्-खुले मुंह से बुदबुदाना ,
और देख कर मेरी भीगी पलकें ,
तुम्हारा कुछ हौले से मुस्काना ,
जिवन्त कर चुके हैं ऐसे कई पल मुझको ,
जिंदगी लेती है क्यों फिर करवटें बार बार,
मेरे शब्दों को, उन दरवाजों , और घर के आँगन को,
अब भी इन्तजार है तुम्हारा,
काश धुंधला ही सही सच हो जाता वो एहसास तुम्हारा ..........
Monday, October 10, 2011
एक अनजाने भय से,
अक्सर मै सहमा रहता हूँ ,
कहीं अकेला न पड़ जाऊ,
इसलिय यादों की नीवं को ,
मजबूत बनाने की कोशिश करता हूँ,
ये मानकर चलता हूँ ,
कोशिश में तुम भी बराबर हो , मेरे साथ,
साथ चलोगी, जानता हूँ , बहुत ज्यादा न सही ,
पर कुछ तो , वही बहुत है मेरे लिय,
किस मोड़ पर छोड़ दोगी साथ मेरा, नही जानता ,
पर रास्ते तो मोड़ के आगे भी हैं,
कैसे चल पाऊंगा, तुम्हारे बिना,
चाहता हूँ,
इसलिय तुमसे कुछ पल, कुछ निशानियाँ, कुछ यादें,
और कुछ यादों को याद करने वाली सजीवता ,
ताकि रात में किसी तारे को देख कर नम ना हो जाएँ आँखे मेरी
तुम्हारी यादें, निशानियाँ .....
अवलम्बन होगीं, मेरे लिय
मोड़ के आगे के रास्तों की मंजिल होगी .....
इसलिय दे दो कुछ पल, कुछ निशानियाँ, कुछ यादें.....
Monday, August 29, 2011
समय का क्या है वो तो कृष्ण कि तरह छलिया है
कभी धूप तो कभी साया घना है,
तुम कहते हो जरा ठहरो राह में,
विश्राम करो इस छाव में,
पर सोचो……
उस धूल भरी पगडंडी के उसपार मेरा घरौंदा है,
वो भी तो इस गतिशील समय की लीला है,
न सोचा था की कभी घिर जायेंगे बादल उदासी के,
और न रहेंगे तथ्य कोई गुज़ारिश के,
हर मोड़ महाभारत सा लगता है,
हर कदम पर पार्थ को तलाशता है,
समय का क्या है वो तो कृष्ण कि तरह छलिया है,
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